Sep 23, 2019

अंधविश्वासी दादी की कंठी

एक बार की बात है। गर्मी का मौसम था। बच्चे स्कूल में पढ़ रहे थे। कुछ किसान अपने खेतों में काम कर रहे थे। अंशु नाम का एक लड़का था जो बिहार के समस्तीपुर जिले में रहता था। उसकी एक दादी थी जो अंशु से बहुत प्यार करती थी। दादी, दादा के निधन हो जाने के बाद से वह वैष्णव हो गयी थी तब से वह कंठी धारण कर ली थी। और वह अनेक मंदिरों में पुजा करने जाती थी। दादी और कुछ लोग लहलहाते गेंहू के खेतों में बथुआ तोड़ रहे थे। अंशु नदी में अपने दोस्तों के साथ स्नान कर रहा था। नदी का नाम बूढ़ी गंडक है जिसकी चौड़ाई लगभग 150 मीटर है। एक दिन अंशु और उसके चचेरे भाई दोनों ने नदी में तैराकी में होड़ लगाया जिसमें अंशु के भाई उस होड़ मे प्रथम आया। उस समय ही उसके दादी कपड़े धोने नदी के किनारे आई थी।

        दादी ने अंशु को नहाते हुये देखी और बोलीतुम जल्दी नहा कर बाहर आओ उसके चचेरे भाई ने अंशु को रोकने कि कोशिश किया तो दादी गुस्से में उसे गाली देकर उसे भी बाहर आने को कही। फिर अंशु और उसके भाई दोनों नदी से बाहर आकार कपड़े बदल कर वापस घर गया। कुछ देर बाद अंशु की दादी भी घर पहुंची। अंशु के चचेरे भाई ने अपने मम्मी से शिकायत कर दिया कि दादी ने मुझे गाली दी है। फिर अंशु के दादी और चाची में झगड़ा शुरू हो गया। कुछ देर बाद एक-दूसरे में गाली गलौज होने लगी। चाची को ज्यादा गाली बर्दाश्त नहीं हुआ और उन्होने दादी के बाल पकड़कर पटक दी। अंशु की मम्मी खेत से काम कर के घर आई थी कि देखी उसके चाची और दादी दोनों आपस मे लड़ रहे है। अंशु की मम्मी उस लड़ाई को छुड़ाने की प्रयास की लेकिन उसकी मम्मी चोट खाकर भी लड़ाई छुड़ा ही दी। दादी को पेट में काफी चोटें आयी। कुछ दिनों तक पेट में दर्द होता रहा। जब पेट मे ज्यादा दर्द होने लगा तब दादी को एक अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां डॉक्टर ने यह बताया कि दादी की पेट में जिस स्थान पर चोटें आयी थी वहां घाव बन चुका है। और दादी की इलाज़ होने के बाद डॉक्टर ने कहासमय से दवा ले लेना और मसालेदार सब्जियों आदि से परहेज करना दादी ने डॉक्टर से पुंछीमैं तो कंठी ली हुई है तो ये दवा कैसे लूँगी?” तो डॉक्टर ने आसान भाषा में जवाब दिया कि इसके अलावा इसका कोई इलाज़ नहीं है फिर उस वक्त ही दादी ने अपने गले से कंठी उतार कर कमरे में पड़े टेबल पर रख दी क्योंकि हिन्दू समुदाय के लोग कंठी को पहन कर कुछ भी मांसाहारी चीजों का सेवन नहीं करते है।

    फिर दादी ने सोची कि जब मैं दवा ले ही रही हूँ तो मुर्गी, मछली जैसी अन्य चीजें भी निःसंकोच खा सकती हूँ। दादी ने अंशु के मम्मी से बोली “मुझे मछली बना कर दो”। अंशु की मम्मी ने उसके दादी को मछली बना कर खिलाई। दादी ने फिर से अलग अलग तरह के मांस-मछली बनाने लगी। दादी कि पेट का घाव भी बढ़ता गया और भगवान पर से उनका विश्वास भी उठता गया क्योंकि इतनी पूजा करने के बावजूद भी कोई फायदा न हो सका इसलिए उन्होने चिकन और मछली कि मांग करने लगे थे। फिर लगभग तीन महीने बाद उनकी देहांत हो गयी।

निष्कर्ष: आजकल के लोगों को भी जब कोई शारीरिक समस्याएँ होती है तो चाहे वे व्यक्ति कितना भी धार्मिक क्यों न हो उसे भी डॉक्टर के पास अस्पताल में जाना ही पड़ता है और दवा लेने ही पड़ते हैं। 

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एसकेएमसीएच में बच्चों के मौत पर जनता के प्रति सरकार का रवैया

बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के एक अस्पताल(एसकेएमसीएच) में एनडीटीवी के ग्राउंड रिपोर्ट के मुताबिक एक्यूट एंसिफलाइटिस से मरने वाले बच्चों की संख्या 100 से अधिक हो चुका है जबकि 2014 में भी 139 बच्चों की मौत हो गई थी. 2012 में 178 बच्चों की मौत हो गई थी. अस्पताल में शुरू से ही डॉक्टर, दवाई तथा उचित उपकरणों की अनुपलब्धता रहा है इसका ज़िम्मेवार तो यहाँ की सरकार ही है जब 2014 में जब छोटे छोटे बच्चे मौत हुई तभी यह कहा गया था कि अब इसपर सुधार किया जाएगा लेकिन आजतक ऐसा कुछ भी नहीं लग रहा है कि इसमे कुछ सुधार किया गया हो। इन नेताओं का मंशा सिर्फ गरीब लोगों को जागरूक न कर केवल अमीर लोगों को जागरूक करते है तभी तो अमीर लोग तुरंत किसी अच्छे प्राइवेट या जिस अस्पताल में सारी सुविधाएं हो और गरीब लोग किसी भी छोटे मोटे सरकारी और गैर-सरकारी अस्पतालों में जहां सारी सुविधाएं नहीं मिलती है वहाँ मरीज का इलाज़ कराते है। जिससे गरीब लोगों के मरीजों को सही तरीके से इलाज़ न होने के कारण उन्हें मौत का रास्ता देखना पड़ता है।



यहाँ की सरकार शुरू से ही इस दोहरी नीति के समर्थन में रहा है। वे केवल चुनाव के समय अपनी शक्ल दिखाने तथा जुमलेबाजी करने आ जाते है। लेकिन वे सबसे ज्यादा अमीरों के संपर्क में रहते है क्योंकि वे नेता जब अमीरों के घर जाते है तो वहाँ उनका आदर सत्कार किया जाता है, गर्मी है तो एसी वाले कमरे में बैठाया जाता है, अच्छा भोजन कराया जाता है और ज्यादा प्रश्न भी नहीं किया जाता है। और गरीबों के बीच ये नेता लोग इसलिए नहीं दिखाई देते है क्योंकि यहाँ भी नेताओं का आदर सत्कार होता है, अगर गर्मी है तो हत्था पंखा से हवा लगाते, खुद को अच्छा भोजन नसीब हो या न हो लेकिन नेताओं को अच्छा भोजन कराया जाता है और जब गरीब लोग प्रश्न उठाते है तो वो बार बार बातों को घुमाने की कोशिश करते है और यहाँ तक यह भी बोल देते है कि "क्या मै अपना अपमान करने यहाँ आया था?" फिर इस सवाल को सुनते ही यहाँ के लोग चुप हो जाते है क्योंकि इन गरीब लोगों में जागरूकता नहीं है जागरूक होने के लिए अच्छी शिक्षा की जरूरत होती है जो ग्रामीण स्कूलों में उपलब्ध नहीं है। ये लोग गरीबों को गरीब जानबूझकर रखना चाहते है क्योंकि अपनी कुर्सी गरीब लोगों को ही भ्रमित कर अपना वोट बैंक बनाए हुये है। लेकिन ये कभी कभी तो चुनाव जीतने के लिए गरीबों को लुभा कर भी वोट लेते है क्योंकि ये गरीब जनता नेताओं के सामने बेवकूफ है और यह गरीबों को छोटी मोटी नौकरी तक ही सीमित कर दिया जाता है। अगर जनता ज्यादा पढ़ा तो मुझपर सवाल उठाने लगेगा यह इन नेताओं का मानना है। इसलिए ये सभी नेताएं ऐसा ही चाहते है लेकिन हमलोग ऐसा होने नहीं देंगे। हमलोग एक दूसरे को शिक्षित कर जागरूक करेंगे तथा सभी को समान अधिकार दिलाएँगे।
 

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