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अंधविश्वासी दादी की कंठी

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Saturday, February 23, 2019

अंधविश्वासी दादी की कंठी

एक बार की बात है। गर्मी का मौसम था। बच्चे स्कूल में पढ़ रहे थे। कुछ किसान अपने खेतों में काम कर रहे थे। अंशु नाम का एक लड़का था जो बिहार के समस्तीपुर जिले में रहता था। उसकी एक दादी थी जो अंशु से बहुत प्यार करती थी। दादी, दादा के निधन हो जाने के बाद से वह वैष्णव हो गयी थी तब से वह कंठी धारण कर ली थी। और वह अनेक मंदिरों में पुजा करने जाती थी। दादी और कुछ लोग लहलहाते गेंहू के खेतों में बथुआ तोड़ रहे थे। अंशु नदी में अपने दोस्तों के साथ स्नान कर रहा था। नदी का नाम बूढ़ी गंडक है जिसकी चौड़ाई लगभग 150 मीटर है। एक दिन अंशु और उसके चचेरे भाई दोनों ने नदी में तैराकी में होड़ लगाया जिसमें अंशु के भाई उस होड़ मे प्रथम आया। उस समय ही उसके दादी कपड़े धोने नदी के किनारे आई थी।

        दादी ने अंशु को नहाते हुये देखी और बोलीतुम जल्दी नहा कर बाहर आओ उसके चचेरे भाई ने अंशु को रोकने कि कोशिश किया तो दादी गुस्से में उसे गाली देकर उसे भी बाहर आने को कही। फिर अंशु और उसके भाई दोनों नदी से बाहर आकार कपड़े बदल कर वापस घर गया। कुछ देर बाद अंशु की दादी भी घर पहुंची। अंशु के चचेरे भाई ने अपने मम्मी से शिकायत कर दिया कि दादी ने मुझे गाली दी है। फिर अंशु के दादी और चाची में झगड़ा शुरू हो गया। कुछ देर बाद एक-दूसरे में गाली गलौज होने लगी। चाची को ज्यादा गाली बर्दाश्त नहीं हुआ और उन्होने दादी के बाल पकड़कर पटक दी। अंशु की मम्मी खेत से काम कर के घर आई थी कि देखी उसके चाची और दादी दोनों आपस मे लड़ रहे है। अंशु की मम्मी उस लड़ाई को छुड़ाने की प्रयास की लेकिन उसकी मम्मी चोट खाकर भी लड़ाई छुड़ा ही दी। दादी को पेट में काफी चोटें आयी। कुछ दिनों तक पेट में दर्द होता रहा। जब पेट मे ज्यादा दर्द होने लगा तब दादी को एक अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां डॉक्टर ने यह बताया कि दादी की पेट में जिस स्थान पर चोटें आयी थी वहां घाव बन चुका है। और दादी की इलाज़ होने के बाद डॉक्टर ने कहासमय से दवा ले लेना और मसालेदार सब्जियों आदि से परहेज करना दादी ने डॉक्टर से पुंछीमैं तो कंठी ली हुई है तो ये दवा कैसे लूँगी?” तो डॉक्टर ने आसान भाषा में जवाब दिया कि इसके अलावा इसका कोई इलाज़ नहीं है फिर उस वक्त ही दादी ने अपने गले से कंठी उतार कर कमरे में पड़े टेबल पर रख दी क्योंकि हिन्दू समुदाय के लोग कंठी को पहन कर कुछ भी मांसाहारी चीजों का सेवन नहीं करते है।

    फिर दादी ने सोची कि जब मैं दवा ले ही रही हूँ तो मुर्गी, मछली जैसी अन्य चीजें भी निःसंकोच खा सकती हूँ। दादी ने अंशु के मम्मी से बोली “मुझे मछली बना कर दो”। अंशु की मम्मी ने उसके दादी को मछली बना कर खिलाई। दादी ने फिर से अलग अलग तरह के मांस-मछली बनाने लगी। दादी कि पेट का घाव भी बढ़ता गया और भगवान पर से उनका विश्वास भी उठता गया क्योंकि इतनी पूजा करने के बावजूद भी कोई फायदा न हो सका इसलिए उन्होने चिकन और मछली कि मांग करने लगे थे। फिर लगभग तीन महीने बाद उनकी देहांत हो गयी।

निष्कर्ष: आजकल के लोगों को भी जब कोई शारीरिक समस्याएँ होती है तो चाहे वे व्यक्ति कितना भी धार्मिक क्यों न हो उसे भी डॉक्टर के पास अस्पताल में जाना ही पड़ता है और दवा लेने ही पड़ते हैं। 

Sunday, August 12, 2018

मेरा धरमा तू मेरा करमा तू तेरा सब कुछ मैं मेरा सब कुछ तू


मेरा धरमा तू मेरा करमा तू तेरा सब कुछ मैं मेरा सब कुछ तू 
हर करम अपना करेंगे हर करम अपना करेंगे ऐ वतन तेरे लिए 
दिल दिया है जान भी देंगे ऐ वतन तेरे लिए 
दिल दिया है जान भी देंगे ऐ वतन तेरे लिए 
हर करम अपना करेंगे हर करम अपना करेंगे ऐ वतन तेरे लिए 
दिल दिया है जान भी देंगे ऐ वतन तेरे लिए 
तू मेरा करमा तू मेरा धरमा तू  मेरा अभिमान है 
ऐ वतन मेह्बूब मेरे तुझपे दिल कुर्बान है 
ऐ वतन मेह्बूब मेरे तुझपे दिल कुर्बान है 
हम जियेंगे और मरेंगे ऐ वतन तेरे लिए 
दिल दिया है जान भी देंगे ऐ वतन तेरे लिए 
दिल दिया है जान भी देंगे ऐ वतन तेरे लिए 
हिन्दू मुस्लिम सिख इसाई हम वतन हम-नाम है 
हिन्दू मुस्लिम सिख इसाई हम वतन हम-नाम है 
जो करे इनको जुदा मजहब नहीं, इलज़ाम है 
हम जियेंगे और मरेंगे ऐ वतन तेरे लिए 
दिल दिया है जान भी देंगे ऐ वतन तेरे लिए 
दिल दिया है जान भी देंगे ऐ वतन तेरे लिए 
तेरी गलियों में चलाकर नफरतों की गोलिया 
लूटते है कुछ लूटेरे दुल्हनो की डोलिया 
लूटते है कुछ लूटेरे दुल्हनो की डोलिया 
लूट रहे है आपको अपने घरो को लूट कर 
लूट रहे है आपको अपने घरो को लूट कर 
खेलते है बेखबर अपने लहू से होलिया 
हम जियेंगे और मरेंगे ऐ वतन तेरे लिए 
दिल दिया है जान भी देंगे ऐ वतन तेरे लिए 
हर करम अपना करेंगे ऐ वतन तेरे लिए 
दिल दिया है जान भी देंगे ऐ वतन तेरे लिए 
हर करम अपना करेंगे ऐ वतन तेरे लिए 
दिल दिया है जान भी देंगे 
ऐ वतन तेरे लिए ऐ वतन तेरे लिए ..
ऐ वतन तेरे लिए..

Sunday, August 5, 2018

Wednesday, October 12, 2016

Effect of Positive Thinking in Hindi


क ऋषि के दो शिष्य थे | जिनमें से एक शिष्य सकारात्मक सोच वाला था वह हमेशा दूसरों की भलाई का सोचता था और दूसरा बहुत नकारात्मक सोच रखता था और स्वभाव से बहुत क्रोधी भी था| एक दिन महात्मा जी अपने दोनों शिष्यों की परीक्षा लेने के लिए उनको जंगल में ले गये |
जंगल में एक आम का पेड़ था जिस पर बहुत सारे खट्टे और मीठे आम लटके हुए थे | ऋषि ने पेड़ की ओर देखा और शिष्यों से कहा की इस पेड़ को ध्यान से देखो | फिर उन्होंने पहले शिष्य से पूछा की तुम्हें क्या दिखाई देता है |
शिष्य ने कहा कि ये पेड़ बहुत ही विनम्र है लोग इसको पत्थर मारते हैं फिर भी ये बिना कुछ कहे फल देता है| इसी तरह इंसान को भी होना चाहिए, कितनी भी परेशानी हो विनम्रता और त्याग की भावना नहीं छोड़नी चाहिए | फिर दूसरे शिष्या से पूछा कि तुम क्या देखते हो, उसने क्रोधित होते हुए कहा की ये पेड़ बहुत धूर्त है बिना पत्थर मारे ये कभी फल नहीं देता इससे फल लेने के लिए इसे मारना ही पड़ेगा |
इसी तरह मनुष्य को भी अपने मतलब की चीज़ें दूसरों से छीन लेनी चाहिए | गुरु जी हँसते हुए पहले शिष्य की बढ़ाई की और दूसरे शिष्य से भी उससे सीख लेने के लिए कहा | सकारात्मक सोच हमारे जीवन पर बहुत गहरा असर डालती है | नकारात्मक सोच के व्यक्ति अच्छी चीज़ों मे भी बुराई ही ढूंढते हैं |
उदाहरण के लिए :- गुलाब के फूल को काँटों से घिरा देखकर नकारात्मक सोच वाला व्यक्ति सोचता है की “ इस फूल की इतनी खूबसूरती का क्या फ़ायदा इतना सुंदर होने पर भी ये काँटों से घिरा है ” जबकि उसी फूल को देखकर सकारात्मक सोच वाला व्यक्ति बोलता है की “ वाह ! प्रकर्ति का कितना सुंदर कार्य है कि इतने काँटों के बीच भी इतना सुंदर फूल खिला दिया ” बात एक ही है लेकिन फ़र्क है केवल सोच का |
तो मित्रों, अपनी सोच को सकारात्मक और बड़ा बनाइए तभी हम अपने जीवन में कुछ कर सकते हैं |

Sometimes the smallest things take up the most #room in your #heart.

भारत का रहनेवाला हूँ, भारत की बात सुनाता हूँ

जब ज़ीरो दिया मेरे भारत ने,

 भारत ने, मेरे भारत ने,

 दुनिया को तब गिनती आई 

तारों की भाषा भारत ने दुनिया को पहले सिखलाई 

देता ना दशमलव भारत तो, यूँ चाँद पे जाना मुश्किल था

धरती और चाँद की दूरी का अंदाज़ा लगाना मुश्किल था

सभ्यता जहाँ पहले आई,

 सभ्यता जहाँ पहले आई, पहले जन्मी है जहाँ पे कला

अपना भारत वो भारत है जिसके पीछे संसार चला

संसार चला और आगे बढ़ा, यूँ आगे बढ़ा, बढ़ता ही गया

भगवान करे ये और बढ़े, बढ़ता ही रहे और फूले फले

बढ़ता ही रहे और फूले फले

है प्रीत जहाँ की रीत सदा,

है प्रीत जहाँ की रीत सदा,

है प्रीत जहाँ की रीत सदा, मैं गीत वहाँ के गाता हूँ

भारत का रहनेवाला हूँ, भारत की बात सुनाता हूँ

है प्रीत जहाँ की रीत सदा,

काले गोरे का भेद नहीं, हर दिल से हमारा नाता है

कुछ और न आता हो हमको, हमें प्यार निभाना आता है

जिसे मान चूकी सारी दुनिया, मैं बात वही दोहराता हूँ 

भारत का रहने वाला हूँ, भारत की बात सुनाता हूँ

है प्रीत जहाँ की रीत सदा,

जीते हो किसी ने देश तो क्या, हमने तो दिलों को जीता है

जहाँ राम अभी तक है नर में, नारी में अभी तक सीता है

इतने पावन हैं लोग जहाँ, मैं नीत नीत शीश झुकाता हूँ 

भारत का रहने वाला हूँ, भारत की बात सुनाता हूँ

इतनी ममता नदियों को भी, जहाँ माता कह के बुलाते हैं 

इतना आदर इंसान तो क्या, पत्थर भी पूजे जाते हैं 

उस धरती पे मैने जनम लिया ये सोच, 

ये सोच के मैं इतराता हूँ 

भारत का रहने वाला हूँ, भारत की बात सुनाता हूँ

है प्रीत जहाँ की रीत सदा !

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