Mar 25, 2020

मजदूरों का हाल...

किसी ने सच ही कहा है कि "हाथी के खाने के दांत कुछ और तथा दिखाने के दांत कुछ और"।
जहां हाथी जो एक जानवर है लेकिन फिर भी शातिर वो बुर्जुआ वर्ग है और समझदार इंसान सर्वहारा वर्ग जो जैसा देखते है वैसा ही समझते है।
वहीं सर्वहारा वर्ग आज कोरोना के दहशत के बीच भूखे-प्यासे, कड़ी-धूप में दर-दर भटक रहे है और सरकार तमाशबीन बनी हुई है।
क्या सर्वहारा वर्ग एक डिस्पोजेबल वस्तु के समान है जिससे जब चाहा काम किया फिर काम होने के बाद कचड़े में फेंक दिया?
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